लखनऊ पुलिस के संरक्षण में चल रहा अवैध लाशों का कारोबार !

0
136
डेरा सच्चा सौदा

संतोष सिंह

लखनऊ। दुष्कर्म के मामले में 20 साल की सजा काट रहे सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के पूर्व प्रमुख बाब राम रहीम के 14 अनुयायियों के शव को राजधानी स्थित एक निजी मेडिकल कालेज में लाये जाने की गुत्थी और उलझती जा रही है।

इस सम्बन्ध में बताया जा रहा है कि मार्च से जून के बीच 14 लाशें राजधानी के जीसीआरजी मेडिकल कालेज में लाई गयी थीं। इस मामले में कालेज के ट्रस्टी ओमकार यादव का दावा है कि सभी शवों के साथ उसके पहचान पत्र की कापी लगायी जाती हैं एवं उसके सगे सम्बन्धियों को कालेज प्रशासन की तरफ से धन्यवाद प्रस्ताव भी दिया जाता है। वहीं दूसरी तरफ कालेज प्रशासन पर आरोप है कि इन शवों के साथ न तो कोई डेथ सर्टिफिकेट या और न ही सरकार से इसे प्रदेश में लाने की अनुमति ली गयी थी।

खबरों में मामला आने के बाद राजधानी पुलिस इसकी जांच में जुट गयी है, पर गंभीर प्रश्न है कि क्या बिना किसी सिंडिकेट के बगैर डेथ सर्टिफिकेट व सरकारी अनुमति के हरियाणा से लखनऊ तक किसी लाश को लाया जा सकता है? तो क्या राजधानी में कोई शव तस्करों का गिरोह सक्रिय है?

प्रदेश का स्वास्थ्य महकमा किस हद बीमार है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। डाक्टरों के लापरवाही से होने वाली मौतें तो अब समान्य हो गयी हैं। गोरखपुर से लेकर फर्रूखाबाद तक आक्सीजन की कमी के चलते होने वाली मौतों में कमीशनखोरी का मामला प्रकाश में आने के बाद यदि संशय पैदा होता है कि राजधानी में कमीशन के लिये शवों की तस्करी की जा रहा है।

गौरतलब है राजधानी में गत वर्षों में खून तस्करों से लेकर मानव अंगो का व्यापार करने वाले गिरोहों का भंडाफोड़ हो चुका है। मुन्ना भाई टाइप के डाक्टर पैदा करने वाले गिरोहों के साथ कमीशन लेकर दवाईयां लिखने वाले डाक्टरों का भी खुलासा हो चुका है। जिस कारण से कई बड़े संस्थानों के डाक्टर अभी जेल में बन्द हैं। इससे पता चलता है कि स्वास्थ्य महाकमा किस हद तक संवेदनहीन व नैतिक रूप से पतित हो चुका है। खास बात यह है कि इस प्रकार के धंधो  में लिप्त लोगों की सत्ता के गलियारों में ऊचीं पहुंच के कारण कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाती है।

लेकिन इस सरकारी खानापूर्ति से सिंडिकेट चलाने वालों पर कोई असर नहीं पड़ता है। इस प्रकरण में एक नई अंशका को जन्म दिया कि राजधानी में मिलने वाले लावारिस शवों का क्या होता है? यदि इस बात की जांच की जाय कि लावारिस शवों का क्या होता है? यदि इस बात की जांच किया जाये कि लावारिस शवों में कितने शवों का अन्तिम संस्कार पुलिस या अन्य सम्बन्धित जिम्मेदार विभागों द्वारा किया जाता है तो निश्चित ही राजधानी में शवों का व्यापार करने वाले गिरोहों का भंडाफोड़ हो सकता है। जानकार दबी जुबान में बताते है कि निजी मेडिकल कालेजों में इन शवों की कीमत एक लाख से लेकर पांच लाख तक होती है। यदि समय रहते इसपर अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में शवों को बेंचने के लिये निरीह लोगों की हत्यायें उद्योग का रूप ले लेंगी।

हरियाणा सरकार ने दिये जांच के आदेश

गुरमीत राम रहीम के सिरसा स्थित डेरे से कई अपराधिक किस्म के धंधे खुला खेल फर्रूखाबादी के तर्ज पर पहले से किये जा रहे थे। सिरसा से शवों को राजधानी लखनऊ भेजने के मामले में हरियाणा सरकार ने भी जांच के आदेश दिये है। इस प्रकरण में चर्चा है कि राम रहीम के खिलाफ उसके जो भी अनुयायी जुबान खोलने की कोशिश करते थे उनकी हत्या कर डेरे में ही दफन कर दिया जाता था। खुदाई में वहां काफी कुछ बरामद हुआ जो डेरे के गोरखधन्धे को उजागर करने के लिये पर्याप्त है।

हलांकि खुदाई में नरकंकालों की पुष्टि अधिकारिक तौर नहीं हुई है। लेकिन यह बात जगजाहिर है कि राम रहीम और आशाराम टाइप के धार्मिक ठेकेदारों के ट्रस्टों की शाखाओं का जाल पूरे देश में फैला है। जहां चिकित्सा शिक्षा से लेकर कई प्रकार के औषधि व खाद्य पदार्थों का उत्पादन बिक्री व वितरण किया जाता है। इन ट्रस्टों में काले धन को सफेद करने का धंधा तो लाइसेंस प्राप्त धंधे जैसा हो चुका है। लेकिन इससे हटकर यदि मामले की जांच कर इन ट्रस्टों से जुड़े सम्पत्तियों का पता लगाया जाय तो देश भर में कई निजी कालेजों में इन ट्रस्टों का पैसा लगा पाया जा सकता है। वर्ना यह कैसे सम्भव हो सकता है कि बगैर किसी कनेक्शन के हरियाणा में दान होने वाले शवों को वहां से सैकड़ों किमी दूर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक पहुंचाया जा सकता है।

दलालों ने केजीएमयू से भी साधा था सम्पर्क

इस प्रकरण में चर्चा है कि शवों की खरीद फरोख्त में लिप्त गिरोंहों ने इन शवों को केजीएमयू भेजने के लिये केजीएमयू के लोगों से भी सम्पर्क साधा था। लेकिन कागजी खानापुर्ति न होने के कारण तथा बीच में मिडिया में मामला उजागर होने के कारण योजना सफल नहीं हो पायी।

क्या जांच से बच रही है राजधानी पुलिस

लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने मीडिया को बताया कि सभी शव मार्च से जून के मध्य लखनऊ लाये गये थे। उनके इस बयान से साफ है कि राजधानी में शवों को भेजने का खेल लम्बे समय से चल रहा है। ऐसे में सवाल है कि पुलिस के आला अफसरों के संज्ञान में होने के बाद भी इसकी जांच पहले कभी क्यों नहीं हुई? मामला खुलने के बाद अब यह आवश्यक है कि प्रदेश के सभी ऐसे चिकित्सीय संस्थान जहां छात्रों के अध्ययन के लिये शवों की आवश्यकता होती है उनकी जांच की जाय कि इन संस्थानों को शव किन माध्यमों से प्राप्त होते है। ताकि इस प्रकार के अमानवीय व पैशाचिक कारोबार पर सख्ती से रोक लागयी जा सके।

loading...